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प्रगति का मंत्र

निस्संदेह नदियों को जोडऩे वाली परियोजनाएं यदि विस्थापन और पर्यावरणीय चिंताओं से मुक्त हों तो वे सूखे व जीविका के संकट से जूझ रही बड़ी आबादी के लिये वरदान साबित हो सकती हैं। परियोजना सूखे क्षेत्रों में समृद्धि की बयार ला सकती हैं। कभी पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी की महत्वाकांक्षी नदी जोड़ योजना को तब अमलीजामा पहनाया जा सका जब यमुना की सहायक नदियों केन-बेतवा लिंक परियोजना को अंतत: केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा हरी झंडी दे दी गई। यह परियोजना यदि समय रहते सिरे चढ़ती है तो दशकों से पानी के संकट से जूझ रहे बुंदेलखंड में हरियाली की बयार आएगी और इस क्षेत्र से होने वाले पलायन पर रोक लगेगी। उम्मीद की जा रही है कि उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश के 13 जिलों में फैले बुंदेलखंड के लोगों को अगले दशक में हरियाली के चरागाह देखने को मिल सकते हैं।

दरअसल, लंबे समय से यह परियोजना कई बाधाओं का सामना कर रही थी क्योंकि दोनों राज्यों की सरकारें सहमति के आधार नहीं खोज पायी थी। बताया जा रहा है कि इस परियोजना पर करीब 44,605 करोड़ लागत का अनुमान है, जिसमें से अधिकांश राशि केंद्र सरकार से अनुदान के रूप में प्राप्त होगी। दरअसल, केन नदी से बेतवा नदी में जलराशि स्थानांतरित होने से करीब 10.62 लाख हेक्टयर भूमि की सिंचाई हो सकेगी तथा करीब 62 लाख लोगों को पेयजल उपलब्ध कराया जा सकेगा। इसके अलावा परियोजना का लक्ष्य 103 मेगावाट की जलविद्युत परियोजना को अंजाम देना भी है। साथ ही सालाना 27 मेगावाट सौर ऊर्जा पैदा करने में इससे मदद मिलेगी। दरअसल, भारत में नदियों को जोडऩे की पुरानी महत्वाकांक्षी योजना रही है। यदि इतिहास पर नजर डालें तो नदियों को जोडऩे की शुरुआत 19वीं शताब्दी में हो गई थी। लेकिन उल्लेखनीय तथ्य यह है कि शुरुआती परियोजनाओं का लक्ष्य अंतर्देशीय नेगिवेशन के उद्देश्यों को लेकर था। इसी कड़ी में पेरियार परियोजना को सन् 1895 में लागू किया गया था। इस परियोजना के अंतर्गत पेरियार बेसिन, जो आज केरल राज्य में है, से तमिलनाडु के बैगई बेसिन में जल स्थानांतरित किया जाता था।

दरअसल, कालांतर जनसंख्या वृद्धि के चलते यह परियोजना पानी संकट के चलते सिंचाई व पेयजल भंडारण की योजनाओं का आधार बनी। निस्संदेह, आज ग्लोबल वार्मिंग के खतरे के बीच लगातार बढ़ते बाढ़ व सूखे के संकट में ऐसी परियोजनाएं कारगर समाधान प्रतीत होती हैं। दरअसल, इन विशाल परियोजनाओं की लागत, लाभ-हानि का विश्लेषण और लोगों के विस्थापन की चिंता के कारण समय-समय पर ऐसी परियोजनाओं को अमलीजामा पहनाने में संकोच होता रहा है। वहीं राज्यों की नदियों से जुड़ी लोगों की अस्मिता और राजनीतिक कारण भी ऐसी परियोजना को अंतिम रूप देने में बाधक बने हैं। कभी इनका समय आगे बढ़ाया गया तो कभी कदम पीछे खींचे गये। पानी की हिस्सेदारी को लेकर राज्यों में मतभेद भी इसमें बाधक बने हैं। हालिया उदाहरण के रूप में देखें तो दो साल पूर्व महाराष्ट्र सरकार ने पानी के बंटवारे पर असहमति के चलते गुजरात के साथ दो नदी जोड़ परियोजनाओं से हाथ पीछे खींच लिए थे। विडंबना यह है कि राज्य में गुजरात व केंद्र की तरह भाजपा सरकार होने के बावजूद योजना सिरे न चढ़ सकी।

ऐसे में केन-बेतवा परियोजना को केंद्र के सहयोग से उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश सरकारों द्वारा सिरे चढ़ाना देश के अन्य राज्यों के लिये अनुकरणीय पहल है। जिसका अनुसरण करके अन्य राज्य बड़ी आबादी के जीवन में बड़े बदलाव ला सकते हैं। लेकिन यहां विचारणीय पहलू यह है कि ऐसी बड़ी परियोजनाओं को क्रियान्वित करते वक्त नागरिकों के विस्थापन, पर्यावरणीय चुनौतियों तथा वन्यजीव संरक्षण को प्राथमिकता के आधार पर देखा जाये। इन चिंताओं को दूर करते हुए विकास की राह चुनी जानी चाहिए। कह सकते हैं कि नदियां जुडेंगी, तो देश आगे बढ़ेगा क्योंकि सूखे व पेयजल का संकट देश में पलायन को बढ़ावा देता है। सही मायनो में यह देश की प्रगति का नया मंत्र है, क्योंकि जहां एक बड़े इलाके के लोगों को सूखे-बाढ़ से मुक्ति मिलेगी, वहीं कृषि उत्पादन बढऩे से क्षेत्र व देश में खुशहाली आयेगी।

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